कक्षा 12 राजनीति विज्ञान अध्याय 1: दो ध्रुवीयता का अंत (Class 12 Political Science Chapter 1: The End of Bipolarity in Hindi)
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कक्षा 12 राजनीति विज्ञान अध्याय 1: दो ध्रुवीयता का अंत (Class 12 Political Science Chapter 1: The End of Bipolarity in Hindi)
- 1.1. दो ध्रुवीयता का अर्थ (Meaning of Bipolarity)
- 1.2. सोवियत संघ का विघटन (The Dissolution of the Soviet Union)
- 1.3. एकध्रुवीय विश्व (Unipolar World)
- 1.4. शीत युद्ध के परिणाम (Consequences of the Cold War)
- 1.5. भारत और शीत युद्ध (India and the Cold War)
- 1.6. नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (New International Economic Order – NIEO)
- 1.7. लोकतंत्र की स्थापना और शीत युद्ध का प्रभाव (Establishment of Democracy and the Impact of the Cold War)
- 1.8. शीत युद्ध के बाद के चुनौतियाँ (Post-Cold War Challenges)
- 1.9. वैश्वीकरण (Globalization)
- 1.10. निष्कर्ष (Conclusion)
यह अध्याय कक्षा 12 राजनीति विज्ञान के पहले पाठ, “दो ध्रुवीयता का अंत” पर केंद्रित है। यह पाठ शीत युद्ध के अंत, सोवियत संघ के विघटन, और दुनिया में नई शक्तियों के उदय का अध्ययन करता है। इस अध्याय में, हम शीत युद्ध के कारणों, सोवियत संघ के पतन के कारकों, और इसके वैश्विक प्रभावों पर गहराई से विचार करेंगे। यह अध्याय छात्रों को वैश्विक राजनीति की बदलती गतिशीलता और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में नए रुझानों को समझने में मदद करेगा।
दो ध्रुवीयता का अर्थ (Meaning of Bipolarity)
दो ध्रुवीयता का अर्थ है, एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था जिसमें दो प्रमुख शक्तियाँ होती हैं जो दुनिया पर हावी होती हैं। शीत युद्ध के दौरान, दुनिया दो गुटों में विभाजित थी: एक का नेतृत्व संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) कर रहा था, और दूसरे का नेतृत्व सोवियत संघ (USSR) कर रहा था। ये दोनों महाशक्तियाँ विचारधारा, सैन्य शक्ति और आर्थिक प्रभाव के मामले में एक-दूसरे के विपरीत थीं।
शीत युद्ध की शुरुआत (The Beginning of the Cold War)
शीत युद्ध, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शुरू हुआ। यह युद्ध, वास्तविक युद्ध नहीं था, बल्कि एक वैचारिक और राजनीतिक तनाव था। संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ दोनों ही अपनी विचारधाराओं को दुनिया में फैलाना चाहते थे। संयुक्त राज्य अमेरिका पूंजीवाद और लोकतंत्र का समर्थन करता था, जबकि सोवियत संघ साम्यवाद का समर्थन करता था।
दोनों देशों के बीच अविश्वास और प्रतिस्पर्धा के कारण, दुनिया कई बार परमाणु युद्ध के कगार पर आ गई। क्यूबा मिसाइल संकट (Cuban Missile Crisis) शीत युद्ध का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है जब दुनिया परमाणु युद्ध के सबसे करीब थी।
सोवियत संघ का विघटन (The Dissolution of the Soviet Union)
सोवियत संघ का विघटन 1991 में हुआ, जो शीत युद्ध के अंत का प्रतीक था। सोवियत संघ के पतन के कई कारण थे, जिनमें शामिल हैं:
- आर्थिक कमजोरी: सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था पूंजीवादी देशों की तुलना में धीमी गति से बढ़ रही थी।
- राजनीतिक ठहराव: सोवियत संघ में राजनीतिक सुधारों की कमी थी और लोगों को बोलने की स्वतंत्रता नहीं थी।
- गोरबाचेव के सुधार: मिकेल गोरबाचेव ने पेरेस्त्रोइका (Perestroika) और ग्लासनोस्त (Glasnost) जैसी नीतियाँ शुरू कीं, जिससे समाज में बदलाव आया।
- पूर्वी यूरोप में विद्रोह: पूर्वी यूरोप के देशों में सोवियत संघ के खिलाफ विद्रोह शुरू हो गया।
सोवियत संघ के विघटन के परिणामस्वरूप, 15 नए स्वतंत्र देश बने, जिनमें रूस सबसे बड़ा था।
सोवियत संघ के पतन के कारण (Reasons for the Collapse of the Soviet Union)
सोवियत संघ के पतन के कई कारण थे, जो आपस में जुड़े हुए थे।
- आर्थिक पिछड़ापन: सोवियत अर्थव्यवस्था योजनाबद्ध थी और बाजार की ताकतों के अनुकूल नहीं थी। इससे उपभोक्ता वस्तुओं की कमी और तकनीकी पिछड़ापन हुआ।
- राजनीतिक दमन: सोवियत संघ में एकदलीय शासन था, और लोगों को बोलने और विरोध करने की स्वतंत्रता नहीं थी।
- अफगानिस्तान में युद्ध: सोवियत संघ का अफगानिस्तान में युद्ध एक महंगा और विनाशकारी संघर्ष था जिसने अर्थव्यवस्था पर दबाव डाला।
- गोरबाचेव की नीतियाँ: गोरबाचेव की सुधार नीतियाँ, पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त, अप्रत्याशित परिणाम लेकर आईं, जिससे असंतोष बढ़ा।
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एकध्रुवीय विश्व (Unipolar World)
सोवियत संघ के पतन के बाद, दुनिया एकध्रुवीय हो गई, जिसका अर्थ है कि संयुक्त राज्य अमेरिका सबसे शक्तिशाली देश बन गया। संयुक्त राज्य अमेरिका ने सैन्य, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से दुनिया पर अपना दबदबा बनाया।
एकध्रुवीयता की विशेषताएं (Characteristics of Unipolarity)
- अमेरिकी प्रभुत्व: संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया की एकमात्र महाशक्ति बन गया।
- पूंजीवाद का प्रसार: पूंजीवाद एक प्रमुख आर्थिक मॉडल के रूप में उभरा।
- अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का प्रभाव: संयुक्त राष्ट्र और विश्व व्यापार संगठन जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का महत्व बढ़ा।
- वैश्वीकरण: दुनिया भर में व्यापार, संस्कृति और सूचना का प्रवाह बढ़ा।
शीत युद्ध के परिणाम (Consequences of the Cold War)
शीत युद्ध के कई महत्वपूर्ण परिणाम हुए, जो आज भी दुनिया को प्रभावित करते हैं।
- दो ध्रुवीयता का अंत: सोवियत संघ के पतन से दो ध्रुवीय दुनिया का अंत हो गया।
- नई विश्व व्यवस्था: संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में एक नई विश्व व्यवस्था का उदय हुआ।
- वैश्वीकरण का उदय: वैश्वीकरण ने दुनिया भर में लोगों, वस्तुओं और विचारों के प्रवाह को बढ़ावा दिया।
- क्षेत्रीय संघर्ष: शीत युद्ध के बाद कई क्षेत्रीय संघर्ष हुए, जैसे कि बाल्कन युद्ध और खाड़ी युद्ध।
- शीत युद्ध संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच एक वैचारिक संघर्ष था।
- सोवियत संघ का पतन 1991 में हुआ।
- सोवियत संघ के पतन के कई कारण थे, जिनमें आर्थिक कमजोरी, राजनीतिक दमन और गोरबाचेव के सुधार शामिल थे।
- सोवियत संघ के पतन के बाद दुनिया एकध्रुवीय हो गई।
- शीत युद्ध के परिणामस्वरूप वैश्वीकरण का उदय हुआ।
भारत और शीत युद्ध (India and the Cold War)
भारत ने शीत युद्ध के दौरान गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई, जिसका अर्थ था कि उसने किसी भी गुट में शामिल होने से इनकार कर दिया। भारत ने दोनों महाशक्तियों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने की कोशिश की।
गुटनिरपेक्षता की नीति (Policy of Non-Alignment)
गुटनिरपेक्षता का अर्थ था कि भारत ने शीत युद्ध में किसी भी गुट का पक्ष नहीं लिया। भारत ने अपनी विदेश नीति को स्वतंत्र रखने और अपनी राष्ट्रीय हितों को बढ़ावा देने की कोशिश की।
- स्वतंत्र विदेश नीति: भारत ने अपनी विदेश नीति स्वयं तय की।
- दोनों महाशक्तियों के साथ संबंध: भारत ने दोनों महाशक्तियों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखे।
- विकास पर ध्यान: भारत ने अपने आर्थिक और सामाजिक विकास पर ध्यान केंद्रित किया।
भारत के पहले प्रधानमंत्री, जिन्होंने गुटनिरपेक्षता की नीति की शुरुआत की। उन्होंने भारत को शीत युद्ध के तनाव से दूर रखा और विकास पर ध्यान केंद्रित किया।
नेहरू के बाद प्रधानमंत्री बने, जिन्होंने गुटनिरपेक्षता की नीति को जारी रखा और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में देश का नेतृत्व किया।
गुटनिरपेक्षता की नीति का समर्थन किया, लेकिन सोवियत संघ के साथ मजबूत संबंध बनाए। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारत का नेतृत्व किया।
नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (New International Economic Order – NIEO)
नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) विकासशील देशों द्वारा विकसित एक प्रस्ताव था, जिसका उद्देश्य वैश्विक अर्थव्यवस्था में उनकी स्थिति में सुधार करना था। यह प्रस्ताव 1970 के दशक में संयुक्त राष्ट्र में पेश किया गया था।
NIEO के मुख्य उद्देश्य (Main Objectives of NIEO)
- विकासशील देशों का विकास: विकासशील देशों को आर्थिक सहायता और तकनीकी सहायता प्रदान करना।
- व्यापार में सुधार: विकसित देशों के साथ व्यापार में अधिक निष्पक्षता लाना।
- कच्चे माल की कीमतें: कच्चे माल की कीमतों को स्थिर करना ताकि विकासशील देशों को नुकसान न हो।
- अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार: अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ाना।
लोकतंत्र की स्थापना और शीत युद्ध का प्रभाव (Establishment of Democracy and the Impact of the Cold War)
शीत युद्ध के बाद, कई देशों में लोकतंत्र की स्थापना हुई। सोवियत संघ के विघटन के बाद, पूर्वी यूरोप के देशों में लोकतांत्रिक परिवर्तन हुए।
लोकतंत्र के प्रसार के कारण (Reasons for the Spread of Democracy)
- सोवियत संघ का पतन: सोवियत संघ के पतन ने साम्यवाद के पतन को बढ़ावा दिया।
- वैश्विक दबाव: पश्चिमी देशों ने लोकतंत्र और मानवाधिकारों को बढ़ावा देने पर जोर दिया।
- आर्थिक विकास: आर्थिक विकास ने लोगों को लोकतंत्र की मांग करने के लिए प्रेरित किया।
- सूचना का प्रसार: इंटरनेट और अन्य संचार माध्यमों ने लोकतंत्र के विचारों को फैलाया।
- दो ध्रुवीयता का अंत
- नई विश्व व्यवस्था का उदय
- वैश्वीकरण का प्रसार
- क्षेत्रीय संघर्ष
- सोवियत संघ का पतन
- वैश्विक दबाव
- आर्थिक विकास
- सूचना का प्रसार
शीत युद्ध के बाद के चुनौतियाँ (Post-Cold War Challenges)
शीत युद्ध के बाद दुनिया को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
- आतंकवाद: आतंकवाद एक वैश्विक खतरा बन गया।
- जलवायु परिवर्तन: जलवायु परिवर्तन ने दुनिया भर में पर्यावरणीय समस्याएं पैदा कीं।
- मानवाधिकारों का उल्लंघन: कई देशों में मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ।
- गरीबी और असमानता: दुनिया में गरीबी और असमानता बनी रही।
वैश्वीकरण (Globalization)
वैश्वीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें दुनिया के विभिन्न देशों के बीच आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंध बढ़ रहे हैं। यह सूचना, वस्तुओं और लोगों के प्रवाह को बढ़ावा देता है।
वैश्वीकरण के प्रभाव (Effects of Globalization)
- आर्थिक विकास: वैश्वीकरण ने व्यापार और निवेश को बढ़ावा दिया।
- सांस्कृतिक आदान-प्रदान: वैश्वीकरण ने विभिन्न संस्कृतियों के बीच आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया।
- राजनीतिक प्रभाव: वैश्वीकरण ने अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रभाव को बढ़ाया।
- चुनौतियाँ: वैश्वीकरण ने गरीबी, असमानता और पर्यावरणीय समस्याओं जैसी चुनौतियाँ भी पैदा की हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
इस अध्याय में, हमने दो ध्रुवीयता के अंत, सोवियत संघ के पतन, और एकध्रुवीय दुनिया के उदय का अध्ययन किया। हमने शीत युद्ध के कारणों, परिणामों और भारत पर इसके प्रभाव पर भी विचार किया। हमने वैश्वीकरण और नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था जैसी महत्वपूर्ण अवधारणाओं को भी समझा। यह अध्याय वैश्विक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।
- शीत युद्ध संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच एक वैचारिक संघर्ष था।
- सोवियत संघ का पतन 1991 में हुआ।
- सोवियत संघ के पतन के बाद दुनिया एकध्रुवीय हो गई।
- भारत ने शीत युद्ध के दौरान गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई।
- वैश्वीकरण दुनिया को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।
इस अध्याय को पढ़कर, छात्रों को वैश्विक राजनीति की बदलती गतिशीलता और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में नए रुझानों की बेहतर समझ होगी। आगे, छात्र अंतरराष्ट्रीय संबंधों, राजनीतिक विचारधाराओं और वैश्विक चुनौतियों का अध्ययन जारी रख सकते हैं।