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कक्षा 12 राजनीति विज्ञान अध्याय 1: दो ध्रुवीयता का अंत (Do Dhruviyata Ka Ant)
कक्षा 12 के राजनीति विज्ञान का पहला अध्याय, ‘दो ध्रुवीयता का अंत’ (Do Dhruviyata Ka Ant), शीत युद्ध के बाद की दुनिया का एक महत्वपूर्ण अध्ययन है। यह अध्याय हमें बताता है कि कैसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया दो महाशक्तियों – संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और सोवियत संघ (USSR) – के बीच विभाजित हो गई थी, और कैसे सोवियत संघ के विघटन के साथ ही इस दो ध्रुवीय व्यवस्था का अंत हो गया। इस ब्लॉग पोस्ट में हम इस अध्याय के मुख्य बिंदुओं को विस्तार से समझेंगे, जिनमें शीत युद्ध, सोवियत संघ का विघटन, इसके कारण, प्रभाव और एकध्रुवीय विश्व की शुरुआत शामिल है।
शीत युद्ध: एक परिचय
शीत युद्ध (Cold War) 20वीं सदी का एक महत्वपूर्ण दौर था, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शुरू हुआ और 1991 में सोवियत संघ के विघटन तक चला। यह युद्ध दो विचारधाराओं, पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच एक वैचारिक संघर्ष था। इसमें दोनों महाशक्तियों, अमेरिका और सोवियत संघ, प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में शामिल नहीं हुईं, लेकिन उन्होंने एक-दूसरे को हराने के लिए जासूसी, प्रॉक्सी युद्ध (Proxy Wars), हथियारों की होड़ और प्रचार का सहारा लिया।
- शीत युद्ध की मुख्य विशेषताएं:
- वैचारिक संघर्ष: पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच टकराव।
- हथियारों की होड़: दोनों महाशक्तियों ने परमाणु हथियारों सहित बड़ी मात्रा में हथियार जमा किए।
- प्रॉक्सी युद्ध: वियतनाम युद्ध और कोरियाई युद्ध जैसे संघर्षों में दोनों महाशक्तियों ने अप्रत्यक्ष रूप से भाग लिया।
- गुटबंदी: नाटो (NATO) और वारसॉ संधि (Warsaw Pact) जैसे सैन्य गुटों का निर्माण।
सोवियत संघ का विघटन: कारण और प्रक्रिया
सोवियत संघ का विघटन 1991 में हुआ, जो शीत युद्ध के अंत का प्रतीक था। सोवियत संघ के विघटन के कई कारण थे, जिनमें शामिल हैं:
- आर्थिक ठहराव: सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था स्थिर हो गई थी और वह पश्चिमी देशों की तुलना में पिछड़ रही थी।
- राजनीतिक अक्षमता: सोवियत संघ में राजनीतिक स्वतंत्रता का अभाव था और नागरिकों को बोलने और अपनी राय व्यक्त करने की अनुमति नहीं थी।
- गोर्बाचेव की नीतियाँ: मिखाइल गोर्बाचेव ने पेरेस्त्रोइका (Perestroika – आर्थिक पुनर्निर्माण) और ग्लासनोस्त (Glasnost – खुलेपन) की नीतियाँ शुरू कीं, जिसने सोवियत संघ में बदलाव की प्रक्रिया को तेज किया।
- राष्ट्रवादी आंदोलन: बाल्टिक राज्यों (एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया) और यूक्रेन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रवादी आंदोलन शुरू हो गए।
- अफगानिस्तान में युद्ध: सोवियत संघ का अफगानिस्तान में युद्ध एक महंगा और असफल अभियान था, जिसने सोवियत अर्थव्यवस्था पर और दबाव डाला।
सोवियत संघ के विघटन की प्रक्रिया 1980 के दशक के मध्य में शुरू हुई और 1991 में समाप्त हुई। इस दौरान, कई सोवियत गणराज्यों ने स्वतंत्रता की घोषणा की और अंततः सोवियत संघ का आधिकारिक रूप से विघटन हो गया।
सोवियत संघ के विघटन के प्रभाव
सोवियत संघ के विघटन का दुनिया पर गहरा प्रभाव पड़ा:
- दो ध्रुवीयता का अंत: शीत युद्ध के अंत के साथ ही दो ध्रुवीय विश्व व्यवस्था समाप्त हो गई, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा।
- एकध्रुवीय विश्व की शुरुआत: अमेरिका ने वैश्विक मामलों में अपनी प्रमुखता स्थापित की और एकध्रुवीय विश्व की शुरुआत हुई।
- पूर्वी यूरोप में परिवर्तन: पूर्वी यूरोप के देशों ने साम्यवाद को त्याग दिया और लोकतंत्र और बाजार अर्थव्यवस्था की ओर रुख किया।
- नए देशों का उदय: सोवियत संघ के विघटन से कई नए स्वतंत्र देशों का उदय हुआ, जिनमें रूस, यूक्रेन, बेलारूस, कजाकिस्तान और अन्य शामिल हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में बदलाव: अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में गुटनिरपेक्षता और सहयोग की भावना बढ़ी, लेकिन साथ ही नए संघर्षों और चुनौतियों का भी उदय हुआ।
एकध्रुवीय विश्व: चुनौतियाँ और अवसर
शीत युद्ध के बाद, दुनिया एकध्रुवीय हो गई, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका सबसे शक्तिशाली देश था। हालांकि, एकध्रुवीय दुनिया में भी कई चुनौतियाँ और अवसर मौजूद हैं:
- चुनौतियाँ:
- आतंकवाद: 9/11 के हमलों ने आतंकवाद के खतरे को उजागर किया।
- क्षेत्रीय संघर्ष: कई क्षेत्रों में जातीय और धार्मिक संघर्ष जारी रहे।
- अंतर्राष्ट्रीय अपराध: मानव तस्करी, मादक पदार्थों की तस्करी और साइबर अपराध जैसे मुद्दे।
- अवसर:
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: विभिन्न देशों के बीच सहयोग बढ़ाने की संभावना।
- वैश्विक व्यापार: मुक्त व्यापार और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के अवसर।
- मानवाधिकार: मानवाधिकारों की रक्षा और समर्थन के लिए प्रयास।
अध्याय ‘दो ध्रुवीयता का अंत’ हमें सिखाता है कि दुनिया कैसे बदलती है और किस तरह से महाशक्तियों की भूमिका और प्रभाव समय के साथ बदलते हैं। यह हमें अंतर्राष्ट्रीय संबंधों, राजनीतिक विचारधाराओं और वैश्विक घटनाओं को समझने में मदद करता है। इस अध्याय को पढ़कर, छात्र शीत युद्ध और उसके बाद की दुनिया के बारे में एक व्यापक समझ हासिल कर सकते हैं।
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